कुछ
वर्ष पहले एक बेहतरीन फिल्म आई थी ‘पी.के.’।
ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने बॉक्स ऑफिस पर ज़ोर दार मुनाफ़ा कमाया और बेहद धूम भी मचाई, बावजूद इसके कि देश के एक बहुत बड़े तबके को ये फिल्म
पसंद नहीं आई क्यूंकी इसे देखने के बाद उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं। मुझे तो
समझ नहीं आता कि कैसे एक चलचित्र के माध्यम से भारतवर्ष में लोगों की धार्मिक या
ऐतिहासिक भावनाएं आहत हो जाती हैं।
इस
फिल्म का मुख्य उद्देश्य या प्लॉट था धर्म और धार्मिक क्रियाकलापों के प्रति हमारा
अंधविश्वास दर्शाना। आमिर खान और राजू हिरानी के सफल प्रयासों से बनी ये शानदार
फिल्म हमारी कट्टरपंथी और रूढ़िवादी विचारधारा पर करारा प्रहार है। कैसे एक एलियन
किसी दूसरे गृह से आ कर हमें वो सिखा जाता है जो हम यहाँ पूरी उम्र भर में भी नहीं
सीख पाते।
हालांकि
भारत एक धार्मिक देश है और सर्व धर्म संभाव की भावना और शिक्षा के साथ हम यहाँ बड़े
होते हैं। स्कूल में शायद छठी कक्षा की सोशल साइंस की किताब में सर्वप्रथम “Unity in Diversity” का पाठ हमें पढ़ाया जाता है। यहाँ से धर्म
के प्रति हमारा ज्ञान आरंभ होता है। इससे पहले हम जो जानते हैं वो सिर्फ हमारे घर
में होने वाली ईश्वर की पूजा, इशू की प्रार्थना, खुदा की नमाज़ या गुरु साहिब की अरदास होती है। स्कूल
में बड़े मज़े से हम सीखते हैं कि सारे धर्म एक समान हैं और अनेकता में एकता ही
हमारे देश की उन्नति का गुरुमंत्र है। पर समस्या ये है कि हमें बड़ा भी होना है और
बड़े होते-होते हम एकता भूल अनेकता की तरफ ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं। अब हमारे
लिए धर्म मेरा और तेरा हो जाता है।
मंदिर
के नाम पर मस्जिद के नाम पर, राम के नाम पर, मोहम्मद के नाम पर हम बस लड़े जा रहे हैं। मंदिर बना
लो, मस्जिद बना लो चाहे जितने गुरुद्वारे या
गिरजाघर बना लो। दिलों से जब प्रेम ओझल हो गया हो,
भाईचारा कहीं खो गया हो तो उस ऊपरवाले का झूठ-मूठ का घर बनाने का क्या फायदा? भारत में रहने वाले सिर्फ भारतीय ही क्यूँ नहीं हो
सकते। हिन्दू, मुस्लिम,
सिख, ईसाई,
पारसी, जैन क्यूँ?
ऐसा
नहीं कि मैं धर्म को नहीं मानती या भगवान में विश्वास नहीं रखती। बिलकुल रखती हूँ।
बहुत ज़रूरी है सबके लिए किसी एक सुपर नैचुरल पावर में यकीन रखना। उम्र मेरी भले ही
अभी इतनी नहीं हुई पर मैं चारों धाम की यात्रा कर चुकी हूँ, बहुत सारे पुरातन मंदिरों और पीठों के दर्शन कर चुकी
हूँ। ऐतिहासिक इमारतें मुझे आकर्षित करती हैं। कहीं अपने मन से पहुंची हूँ तो कहीं
बस संयोग से। पर किसी भी देव स्थान के दर्शन के समय मेरे मन में कोई स्वार्थ
समाहित नहीं होता। ना तो मैं कुछ मांगने गयी थी ना कुछ पा लेने की मुझमे कोई चाह
थी। दूर पहाड़ों में बसे किसी दिव्य देवस्थान में बस मुझे असीम शांति मिलती है।
जहां पंडो का शोर न हो। दान पात्र भरने की कोई ज़बरदस्ती ना हो। ईश्वर को महसूस
करने के लिए तो हमारा शांत चित्त ही काफी है पर असल में चित्त शांत करने के लिए
ऐसे सुरम्य और दुरूह स्थानो तक पहुँचना पड़ता है।
बिना
धर्म को जाने और समझे, बिना धार्मिक ग्रन्थों को पढ़े ही हम सुनी
सुनाई बातों पर यकीन करते हुए अपनी विचारधारा बना लेते हैं। कोई भी धर्म या
धर्मग्रंथ जीवो के प्रति हिंसा का समर्थन नहीं करता। पर फिर भी ये हम हैं जो कुछ
कुरीतियों को धर्म के नाम की आढ़ में निभाते हैं और इस प्रकार गलत धारणाओं का उदय
और स्थापन होता है।
हिन्दुत्व
बचाने के लिए मार काट, इस्लाम बचाने के लिए जेहाद। क्या है ये
सब? क्यूँ है ये सब? क्या वाकई हम इतने सामर्थ्यवान हैं जो अपने धर्म और
ईश्वर की रक्षा करने में सक्षम है। क्या आपको ‘पी.के.’ का क्लाइमैक्स याद है। जब तपस्वी और पी.के. के मध्य
अंतिम वाक द्वंद चल रहा होता है-
पीके-
“तुम सही बोलता हैं तपस्वी जी, एक टेम था जब हमरे पास भी खाये के लिए
रोटी नहीं थी, रहे खातिर घर नहीं था, बहुत ही रोता था काहे कि कौनौ दोस्त भी नहीं था। उ
वखत हमरा एक ही सहारा था- भगवान। रोज लगता था कल बेहतर होगा, भगवान कोई रास्ता दिखाएगा। हम मानता हूँ भगवान में विस्वास
रखे से उम्मीद मिलता है, तकलीफ से जूझे खातिर हिम्मत मिलता है, ताकत मिलता है पर हमरा एक ठो सवाल है, कौन से भगवान पे विस्वास करें? आप लोग बोलता है एक भगवान है हम बोलता है नाईं दुई
भगवान है। एक जौन हम सबको बनाया और एक जे को तुम लोग बनाए। वो जो हम सबको बनाया उ
के बारे में हम कुच्छो नहीं जानते पर जे को तुम लोग बनाए वो बिलकुल तुम्हारी तरह
है, छोटा,
घूस लेने वाला, झूठे वादे करता है, अमीरों को जल्दी मिलता है, गरीबों को लेन में खड़ा करता है। तारीफ से खुश होता है, बात-बात पे डराता है। हमरा राइट नंबर एक दम सिंपल है
जौन भगवान हम सबको बनाया उ में विस्वास करो और जे का तुम लोग बनाए हो उ डुप्लीकेट
गॉड को हटाई दो।“
तपस्वी-
“आप हमारे भगवान को हांथ लगाएंगे और हम चुपचाप बैठेंगे। बेटा, हमें अपने भगवान की रक्षा करना आता है।“
पीके-
“तुम करेगा रच्छा भगवान का। तुम! अरे इत्ता सा है ई गोला, इससे बड़ा लाखों करोड़ो गोला घूम रहा है अंतरिक्स मा और
तुम ये छोटा सा गोला का छोटे सा सहर की छोटी सी गली में बैठ के बोलता है कि तुम उ
की रच्छा करेगा, जौन ये सारा जहान बनाया। उ को तोहार
रक्छा का ज़रूरत नाहीं है। उ अपनी रक्छा खुद ही कर सकता है। आज कौनों अपना खुदा का
रक्छा करने का कोसिस किया और हमरा दोस्त चला गया। बस ई रह गवा है उ का जूता। अपने
भगवान की रक्छा करना बंद करो नहीं तो ई गोला पे इंसान नहीं सिर्फ जूता रह जाएगा।“
तपस्वी-
“एक मुसलमान बम फोड़े और एक हिन्दू गुरु यहाँ बैठ के तुम्हारा लेक्चर सुने। ये
अच्छा है, अच्छा है।“
पीके-
“कौन हिन्दू? कौन मुसलमान? ठप्पा कहाँ है दिखाओ। ई फरक भगवान नहीं तुम लोग बनाया
है और ए ही ई गोला का सबसे डेंजर रौंग नंबर है।“
इस
पूरे संवाद को मैंने अक्षरशः यहाँ इसलिए उद्धरित किया है क्यूंकी ये बहुत साधारण
सी आसानी से समझ में आने वाली बात है, कोई रॉकेट साइंस नहीं है जिसे समझने में
किसी को भी परेशानी हो। ईश्वर, अल्लाह बस एक अद्भुत शक्ति है जिसमें
विश्वास रखने से हमें साहस मिलता है। अगर धर्म कुछ है तो वो है इंसानियत/मानवता।
जानवरों की बली दे के, ढेर सारा चढ़ावा चढ़ा के, वी.आई.पी. लाइन में लग कर दर्शन कर के, चादर चढ़ा के और किसी मूरत पर दूध-दही-घी की नदियां
बहा के भगवान किसी को नहीं मिलता। भव्य और विशाल मंदिरों का निर्माण करा लो, स्वर्ण मूर्तियाँ स्थापित करा लो पर यदि मानवता के
प्रति संभाव ना हो तो ऐसे स्थान पर ईश्वर का वास कभी नहीं होता। ये हमारे ही हांथ में
है कि हम अपनी धरती पर क्या चाहते हैं। सुखी, प्रसन्न,
मिलनसार मानवता या फिर जूतों का ढेर।
ईश्वर
या ईश्वर का कोई भी घर हो मंदिर, मस्जिद,
गुरुद्वारा या गिरजाघर। हर स्थान का मन्तव्य एक ही है। प्रेम, आस्था, श्रद्धा,
समर्पण और शांति। चाहे किसी मंदिर में सुनाई देता राम/कृष्ण का भजन हो या निज़ामुद्दीन
औलिया की दरगाह में गाया जाता ‘छाप तिलक सब छीनी’, महसूस कर के देखिये तो दोनों ही ईश्वर से मिलवाते हैं।
एक समान ही हृदय को छूते हुए आत्मा तक पहुँच जाते हैं। साईं धाम या तिरुपति बालाजी
में करोड़ों रुपया दान करने के स्थान पे किसी गरीब बच्चे का भविष्य बना दीजिये, किसी असहाय बीमार का उपचार करा दीजिये, किसी गरीब बेटी का विवाह करा दीजिये और उसका भविष्य सुरक्षित
कर दीजिये। दरगाहों पर चादर चढ़ाने की बजाए निर्वस्त्रों का तन ढक दीजिये। मूर्तियों
पर दूध, दही बहाने के बजाए भूखों को खाना खिला दीजिये।
यकीन मानिए आपको ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होगी।
(और
जो कुछ करने का मन ना बने तो बस इतना करिए कि समय पर अपना कर भरिये, बिजली चोरी ना करिए,
संसाधनों का दुरुपयोग ना कीजिये और देश की प्रगति/उन्नति में योगदान दीजिये।)
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धर्म का मूल मंत्र प्रेम, दया व सदभावना है, जिसको आपने अच्छी तरह से व्यक्त किया है I
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